पहाड़ों से पलायन का दर्द बड़े पर्दे पर, फिल्म ‘पायर’ ने दुनिया के सामने रखी गांवों की मार्मिक हकीकत

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बीडी कसनियाल

बुजुर्ग दंपति की कहानी में दिखा पहाड़ का अकेलापन, 28 साल से बेटे की राह देख रहे माता-पिता की पीड़ा ने झकझोरा

पिथौरागढ़ । उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन की गंभीर समस्या और उसके सामाजिक दुष्परिणामों को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाली फिल्म ‘पायर’ इन दिनों चर्चा में है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार विनोद कापड़ी द्वारा लिखित, निर्देशित और निर्मित यह फिल्म पहाड़ के उन गांवों की दर्दनाक तस्वीर पेश करती है, जहां पलायन ने न केवल पारंपरिक अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, बल्कि परिवार और सामाजिक ताने-बाने को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

फिल्म की कहानी हिमालय के एक दूरस्थ गांव में रहने वाले बुजुर्ग दंपति आमा और बुबू के इर्द-गिर्द घूमती है। उनका इकलौता बेटा रोजगार की तलाश में शहर चला गया है और पिछले 28 वर्षों से माता-पिता उसकी वापसी की राह देख रहे हैं। बुढ़ापे में उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि दोनों में से किसी एक की मृत्यु हो गई तो गांव में कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं बचेगा, जो उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक पहुंचा सके। इस भयावह हकीकत के बीच दोनों ने अपने घर के पास ही एक-दूसरे के अंतिम संस्कार के लिए चिता तक तैयार कर रखी है।

फिल्म की खासियत केवल पलायन की समस्या को दिखाना नहीं, बल्कि बुजुर्ग दंपति के बीच रोजमर्रा की नोकझोंक, खामोशी और आंखों में छिपे दर्द को बेहद संवेदनशील तरीके से पर्दे पर उतारना भी है।

बेरीनाग निवासी पत्रकार सुधीर राठौर, जो फिल्म की निर्माण टीम से भी जुड़े हैं, के अनुसार फिल्म में पहाड़ के दूरस्थ गांवों की लगभग शत-प्रतिशत वास्तविकता दिखाई गई है। उन्होंने बताया कि फिल्म में आमा और बुबू की भूमिका किसी पेशेवर कलाकार ने नहीं, बल्कि निर्माता द्वारा चुने गए स्थानीय गैर-पेशेवर कलाकारों ने निभाई है, जिन्हें सीमित समय में प्रशिक्षण देकर इस किरदार के लिए तैयार किया गया।

राठौर के मुताबिक, पहाड़ में पलायन की स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई बार गांवों में युवा और अन्य ग्रामीण उपलब्ध नहीं होने के कारण सीमा सुरक्षा बल के जवानों को भी मृतकों के शव श्मशान घाट तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ी है।

30 अक्टूबर को देशभर में रिलीज हुई ‘पायर’ विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अब तक 18 पुरस्कार हासिल कर चुकी है, जिनमें 15 सर्वश्रेष्ठ फिल्म के पुरस्कार शामिल हैं। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के कई फिल्म समारोहों में मिली यह उपलब्धि फिल्म के विषय और प्रस्तुति की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।

फिल्मकार विनोद कापड़ी ने फिल्म की देशव्यापी रिलीज पर कहा कि इस सपने को साकार करने में उन्हें आठ वर्षों का लंबा संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उम्मीद, निराशा और हताशा के कई दौर आए, लेकिन पहाड़ के पलायन की पीड़ा को बड़े पर्दे तक पहुंचाने का उनका संकल्प बना रहा।

कापड़ी ने बताया कि 84 वर्षीय केशर सिंह और उनकी पत्नी से मुलाकात ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। दूरस्थ गांव में अकेले रह रहे इस बुजुर्ग दंपति का अपने इकलौते बेटे की प्रतीक्षा करना ही फिल्म की कहानी का आधार बना। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित संगीतकार और ऑस्कर विजेता माइकल डैना ने भी फिल्म की सराहना की, जबकि भारतीय सिनेमा के दिग्गज गुलजार ने बिना कोई शुल्क लिए फिल्म के लिए गीत लिखने की सहमति दी। इसके बावजूद फिल्म के निर्माण के लिए लंबे समय तक आर्थिक सहयोग नहीं मिल सका।

‘पायर’ महज एक फिल्म नहीं, बल्कि पहाड़ के उन सूने होते गांवों, टूटते पारिवारिक रिश्तों और अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों की पीड़ा का दस्तावेज है, जो पलायन की गंभीरता पर समाज और सरकार दोनों को सोचने के लिए मजबूर करती है।