शंकराचार्य अद्वैत वेदांत परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक आचार्य माने जाते हैं। इस परंपरा की स्थापना 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी। उन्होंने सनातन धर्म को संगठित और मजबूत करने के लिए भारत की चारों दिशाओं में चार मठ (पीठ) स्थापित किए—
श्रृंगेरी मठ (कर्नाटक – दक्षिण)
ज्योतिर्मठ/बद्रीनाथ मठ (उत्तराखंड – उत्तर)
गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा – पूर्व)
शारदा मठ (द्वारका, गुजरात – पश्चिम)
इन चारों मठों के प्रमुख को ही शंकराचार्य कहा जाता है।
शंकराचार्य कैसे चुने जाते हैं?
शंकराचार्य कोई चुनावी या सरकारी पद नहीं है। यह पद परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार मिलता है। संबंधित मठ के वरिष्ठ संन्यासी और विद्वान मिलकर ऐसे संन्यासी का चयन करते हैं जो—
वेद, उपनिषद, गीता और शास्त्रों का गहरा ज्ञान रखता हो
ब्रह्मचर्य, वैराग्य और संयम का पालन करता हो
जीवन और आचरण से संन्यास परंपरा का आदर्श प्रस्तुत करता हो
लंबे समय से मठ परंपरा से जुड़ा हुआ हो
गुरु के ब्रह्मलीन होने या पद त्यागने पर योग्य शिष्य को विधिवत अनुष्ठान के साथ शंकराचार्य घोषित किया जाता है।
संक्षेप में, शंकराचार्य सनातन धर्म और अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च मार्गदर्शक होते हैं और यह पद विद्वता, तपस्या और परंपरा के आधार पर प्राप्त होता है, न कि किसी नियुक्ति से।
शंकराचार्य कौन होते हैं और यह पदवी कैसे मिलती है?
