पिथौरागढ़। हिमालयी सीमांत क्षेत्र लपथल-मिलम से तराई-भाभर की ओर होने वाला पारंपरिक सीजनल माइग्रेशन (मौसमी पलायन) इस वर्ष भी शुरू हो गया है। लगभग हजार वर्षों से चली आ रही इस अनवरत परंपरा के तहत जोहार घाटी के बुग्याली इलाकों में रहने वाले भोटिया समुदाय के लोग हर साल सर्दियों के आगमन के साथ अपने मवेशियों और परिवारों सहित निचले इलाकों की ओर रुख करते हैं।
यह स्थानांतरण सिर्फ आजीविका से जुड़ा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति, पहचान और जीवनशैली का प्रतीक भी है। गर्मियों में ये समुदाय ऊंचाई वाले इलाकों में रहते हैं, जहां वे ऊनी उत्पादों, जड़ी-बूटियों और चरवाहे जीवन से जुड़ी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। सर्दियों में बर्फबारी शुरू होते ही वे तराई-भाभर क्षेत्र में आकर बस जाते हैं, जहां मौसम अनुकूल होता है और पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध रहता है।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इस पारंपरिक पलायन ने न केवल पर्वतीय और तराई समाजों को सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखा है, बल्कि यह आज भी पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
