कुमाऊँ के स्थान नामों में छिपा इतिहास,संस्कृति और भाषा का गहन अध्ययन

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बीडी कसनियाल/पिथौरागढ़

स्थान-नाम विज्ञान (टोपोनिमी) एक उभरता हुआ सामाजिक अनुशासन है, जिसका विशेष महत्व अवर्गीकृत इतिहास, संस्कृति, समाज, अर्थव्यवस्था, धर्म तथा किसी क्षेत्र की भाषाओं के विकास को समझने में है। किसी स्थान के नाम धार्मिक ग्रंथों की तरह स्थायी होते हैं और यदि इन्हें बदलने का प्रयास किया जाए तो इससे उस क्षेत्र की पहचान के खोने का खतरा पैदा हो जाता है।

स्थान-नामों के अध्ययन का यह अनुशासन बहुत पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 19वीं सदी के अंतिम दशकों में यूरोप में हुई और बाद में बंगाल के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप में इसका विस्तार हुआ। कुमाऊँ क्षेत्र में इस विषय पर ताराचंद्र त्रिपाठी, कल्पना पंत और डॉ. देव सिंह पोखरिया का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बात डॉ. भंडारी ने कही।

सेवानिवृत्त अंग्रेज़ी के प्राध्यापक और सामाजिक विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले डॉ. शीतल सिंह भंडारी द्वारा लिखित नई पुस्तक ‘कुमाऊँ के स्थान नामों का अध्ययन’ स्थानीय इतिहास, संस्कृति, बोली और समाज में रुचि रखने वाले पाठकों को स्थान-नामों के अध्ययन के महत्व की याद दिलाती है। इस अध्ययन में कुमाऊँ मंडल के सभी छह जनपदों को शामिल किया गया है तथा प्राचीन कोल संस्कृति काल से लेकर हिमालयी क्षेत्र में खसों के आगमन तक के गांवों और स्थानों के नामों का विश्लेषण किया गया है।

विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में प्रचलित बोलियों और भाषाई भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए लेखक ने कुमाऊँ क्षेत्र के स्थान-नामों पर विभिन्न जातीय प्रभावों का अध्ययन किया है। इसमें कोल, किरात, द्रविड़, यक्ष, मुंडा और खस काल के साथ-साथ कुलिंद, कुषाण, दरद, शक, तंगण और पार्तंगण जैसी प्राचीन जातियों की छाप को भी रेखांकित किया गया है। डॉ. भंडारी के अनुसार, स्थान-नामों में प्रयुक्त प्रत्यय और उपसर्ग—जो निवास-स्थल, पर्वतीय भू-आकृति, जाति, व्यक्ति या पवित्र स्थलों को दर्शाते हैं—अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये शब्द किसी विशेष संस्कृति, भाषा या धर्म से जुड़े संकेत देते हैं।

पुस्तक की शुरुआत कुमाऊँ के सभी छह जनपदों के नामों की व्याख्या से होती है। लेखक बताते हैं कि ‘कुमाऊँ’ नाम भगवान विष्णु के कच्छप (कछुआ) अवतार से विकसित हुआ, जबकि चंपावत, बागेश्वर, अल्मोड़ा, नैनीताल और ऊधम सिंह नगर के नामों की उत्पत्ति अलग-अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है। इसी प्रकार ‘लाख’, ‘धूरा’, ‘गैर’, ‘कांडा’, ‘खोला’, ‘स्यारी’, ‘तिर’, ‘चीना’, ‘सिम’, ‘गल’, ‘कट्या’, ‘गढ़’, ‘गोठ’, ‘सैल’ और ‘धार’ जैसे उपसर्ग या प्रत्यय वाले स्थान-नाम हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट पहचान को दर्शाते हैं, जो देश के अन्य भागों में प्रायः नहीं मिलते।

डॉ. भंडारी के अनुसार, कुमाऊँ ही नहीं बल्कि समग्र हिमालयी क्षेत्र के स्थान-नाम मूल बसावटों, जन-प्रवास, भू-आकृतिक परिस्थितियों, उस समय की आर्थिक और राजनीतिक घटनाओं, जलवायु, वनस्पति और जीव-जंतुओं की ओर भी संकेत करते हैं, जिनका सामना यहां के प्रारंभिक निवासियों को करना पड़ा।

कुमाऊँ क्षेत्र में स्थान-नामों के माध्यम से संस्कृति के भीतर पैठ बनाने वाला यह कार्य अत्यंत सराहनीय है और इसे आगे और विकसित किए जाने की आवश्यकता है। हिमालयी क्षेत्र अनेक जातियों का निवास-स्थल रहा है, किंतु यहां के ऐतिहासिक साक्ष्य सीमित कालखंड तक ही उपलब्ध हैं, जबकि यहां मानव बसावट अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। यदि स्थान-नामों, रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं का गहन अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि हिमालय के प्राचीन निवासी कौन थे और किन परिस्थितियों में उन्होंने यहां जीवन यापन किया। यह विचार पिथौरागढ़ के सांस्कृतिक लेखक पद्मा दत्त पंत ने व्यक्त किए।